“Militarize Hindus and Hinduize Politics” – Veer Savarkar

AUSTRIANS BUY  70,000 SHOT GUNS
AMID FEARS OF A MASSIVE INFLUX OF MUSLIM REFUGEES

How come Hindus and their  leaders in India who are surrounded by 500 million Muslims maintain deafening silence about the danger to the existence of Hindus?

http://www.dailymail.co.uk/news/article-3291978/Shotguns-virtually-sold-Austria-citizens-rush-buy-arms-amid-fears-massive-influx-migrants-dealers-claim.html

“Militarize Hindus and Hinduize Politics” – Veer Savarkar

Muslims from Middle East are pouring in European countries in tens of thousands.  There is a fear psychosis  in the minds of European countries that their culture will be  destroyed  and their country will be taken over by radical Islamists in due course of time.  Hence they are buying  assault rifles and getting ready to handle these violent people.

On the other hand,  in Indian Sub-continent there are about 500 million Muslims  (180 millions  in Pakistan, 150 millions in Bangladesh,  and 160-170 millions in India)  whose avowed aim is to Islamize India and establish Nizam-e-Mustafa (Islamic rule).

Half a million Kashmiri Hindus have been driven from the Valley.  Seven districts in Assam and three districts in West Bengal have become a Muslim majority area.  Muslim population in Assam is about 40%, in West Bengal it is 30%, in U.P.  it is 22%, and in Kerala it is 24%.  On the other hand, Hindu population in India has come down to less than 80% and Muslim population has more than doubled and assumed an alarming proportion.

While presence of a few thousands Muslims in European countries has sent shivers down their spine, no Hindu leader has come up with a plan to protect Hindus from the impending doom and disaster to be caused by the seditious and rebellious  activities  by  half a billion Islamic  supremacists  whose forefathers  had forcibly wrested one third of India from Hindus and declared it  as an Islamic Nation.

Hindu leaders should learn a lesson or two from their History and discard the methodology which has failed us in the past .

Hence, it is incumbent on Hindus to identify  their real enemy and find  ways and means to extirpate them. 

One alternative  for the survival of Hindu Nation is  to emulate Veer  Savarkar, the great Hindu revolutionary and fearless  freedom fighter,  who had said that “Militarize Hindus and Hinduize Politics”.  Jai Hind!

Very truly yours, 

Narain Kataria
(718) 478-5735

Blog:  Narainkataria.blogspot.com

 

 

 

 

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AKBAR WAS A GREAT DEMON महान नही शैतान था अकबर

अकबर के समय के इतिहास लेखक अहमद यादगार ने लिखा-

“बैरम खाँ ने निहत्थे और बुरी तरह घायल हिन्दू राजा हेमू के हाथ पैर बाँध दिये और उसे नौजवान शहजादे के पास ले गया और बोला, आप अपने पवित्र हाथों से इस काफिर का कत्ल कर दें और”गाज़ी”की उपाधि कुबूल करें, और शहजादे ने उसका सिर उसके अपवित्र धड़ से अलग कर दिया।” (नवम्बर, ५ AD १५५६)
(तारीख-ई-अफगान,अहमद यादगार,अनुवाद एलियट और डाउसन, खण्ड VI, पृष्ठ ६५-६६)

इस तरह अकबर ने १४ साल की आयु में ही गाज़ी (काफिरों का कातिल) होने का सम्मान पाया।

इसके बाद हेमू के कटे सिर को काबुल भिजवा दिया और धड़ को दिल्ली के दरवाजे पर टांग दिया।

अबुल फजल ने आगे लिखा – ”हेमू के पिता को जीवित ले आया गया और नासिर-उल-मलिक के सामने पेश किया गया जिसने उसे इस्लाम कबूल करने का आदेश दिया, किन्तु उस वृद्ध पुरुष ने उत्तर दिया, ”मैंने अस्सी वर्ष तक अपने ईश्वर की पूजा की है; मै अपने धर्म को कैसे त्याग सकता हूँ?
मौलाना परी मोहम्मद ने उसके उत्तर को अनसुना कर अपनी तलवार से उसका सर काट दिया।”
(अकबर नामा, अबुल फजल : एलियट और डाउसन, पृष्ठ २१)

इस विजय के तुरन्त बाद अकबर ने काफिरों के कटे हुए सिरों से एक ऊँची मीनार बनवायी।

२ सितम्बर १५७३ को भी अकबर ने अहमदाबाद में २००० दुश्मनों के सिर काटकर अब तक की सबसे ऊँची सिरों की मीनार बनवायी और अपने दादा बाबर का रिकार्ड तोड़ दिया। (मेरे पिछले लेखों में पढ़िए) यानी घर का रिकार्ड घर में ही रहा।

अकबरनामा के अनुसार ३ मार्च १५७५ को अकबर ने बंगाल विजय के दौरान इतने सैनिकों और नागरिकों की हत्या करवायी कि उससे कटे सिरों की आठ मीनारें बनायी गयीं। यह फिर से एक नया रिकार्ड था। जब वहाँ के हारे हुए शासक दाउद खान ने मरते समय पानी माँगा तो उसे जूतों में भरकर पानी पीने के लिए दिया गया।
अकबर की चित्तौड़ विजय के विषय में अबुल फजल ने
लिखा था- ”अकबर के आदेशानुसार प्रथम ८०००
राजपूत योद्धाओं को बंदी बना लिया गया, और बाद में उनका वध कर दिया गया। उनके साथ-साथ विजय के बाद प्रात:काल से दोपहर तक अन्य ४०००० किसानों का भी वध कर दिया गया जिनमें ३००० बच्चे और बूढ़े थे।”
(अकबरनामा, अबुल फजल, अनुवाद एच. बैबरिज)

चित्तौड़ की पराजय के बाद महारानी जयमाल मेतावाड़िया समेत १२००० क्षत्राणियों ने मुगलों के हरम में जाने की अपेक्षा जौहर की अग्नि में स्वयं को जलाकर भस्म कर लिया। जरा कल्पना कीजिए विशाल गड्ढों में धधकती आग और दिल दहला देने वाली चीखों-पुकार के बीच उसमें कूदती १२००० महिलाएँ ।

अपने हरम को सम्पन्न करने के लिए अकबर ने अनेकों हिन्दू राजकुमारियों के साथ जबरनठ शादियाँ की थी परन्तु कभी भी, किसी मुगल महिला को हिन्दू से शादी नहीं करने दी। केवल अकबर के शासनकाल में 38 राजपूत राजकुमारियाँ शाही खानदान में ब्याही जा चुकी थीं। १२ अकबर को, १७ शाहजादा सलीम को, छः दानियाल को, २ मुराद को और १ सलीम के पुत्र खुसरो को।

अकबर की गंदी नजर गौंडवाना की विधवा रानी दुर्गावती पर थी
”सन् १५६४ में अकबर ने अपनी हवस की शांति के लिए रानी दुर्गावती पर आक्रमण कर दिया किन्तु एक वीरतापूर्ण संघर्ष के बाद अपनी हार निश्चित देखकर रानी ने अपनी ही छाती में छुरा घोंपकर आत्म हत्या कर ली। किन्तु उसकी बहिन और पुत्रवधू को को बन्दी बना लिया गया। और अकबर ने उसे अपने हरम में ले लिया। उस समय अकबर की उम्र २२ वर्ष और रानी दुर्गावती की ४० वर्ष थी।”
(आर. सी. मजूमदार, दी मुगल ऐम्पायर, खण्ड VII)

सन् 1561 में आमेर के राजा भारमल और उनके ३ राजकुमारों को यातना दे कर उनकी पुत्री को साम्बर से अपहरण कर अपने हरम में आने को मज़बूर किया।
औरतों का झूठा सम्मान करने वाले अकबर ने सिर्फ अपनी हवस मिटाने के लिए न जाने कितनी मुस्लिम औरतों की भी अस्मत लूटी थी। इसमें मुस्लिम नारी चाँद बीबी का नाम भी है।

अकबर ने अपनी सगी बेटी आराम बेगम की पूरी जिंदगी शादी नहीं की और अंत में उस की मौत अविवाहित ही जहाँगीर के शासन काल में हुई।

सबसे मनगढ़ंत किस्सा कि अकबर ने दया करके सतीप्रथा पर रोक लगाई; जबकि इसके पीछे उसका मुख्य मकसद केवल यही था की राजवंशीय हिन्दू नारियों के पतियों को मरवाकर एवं उनको सती होने से रोककर अपने हरम में डालकर एेय्याशी करना।

राजकुमार जयमल की हत्या के पश्चात अपनी अस्मत बचाने को घोड़े पर सवार होकर सती होने जा रही उसकी पत्नी को अकबर ने रास्ते में ही पकड़ लिया।
शमशान घाट जा रहे उसके सारे सम्बन्धियों को वहीं से कारागार में सड़ने के लिए भेज दिया और राजकुमारी को अपने हरम में ठूंस दिया ।

इसी तरह पन्ना के राजकुमार को मारकर उसकी विधवा पत्नी का अपहरण कर अकबर ने अपने हरम में ले लिया।

अकबर औरतों के लिबास में मीना बाज़ार जाता था जो हर नये साल की पहली शाम को लगता था। अकबर अपने दरबारियों को अपनी स्त्रियों को वहाँ सज-धज कर भेजने का आदेश देता था। मीना बाज़ार में जो औरत अकबर को पसंद आ जाती, उसके महान फौजी उस औरत को उठा ले जाते और कामी अकबर की अय्याशी के लिए हरम में पटक देते। अकबर महान उन्हें एक रात से लेकर एक महीने तक अपनी हरम में खिदमत का मौका देते थे। जब शाही दस्ते शहर से बाहर जाते थे तो अकबर के हरम
की औरतें जानवरों की तरह महल में बंद कर दी जाती थीं।

अकबर ने अपनी अय्याशी के लिए इस्लाम का भी दुरुपयोग किया था। चूँकि सुन्नी फिरके के अनुसार एक मुस्लिम एक साथ चार से अधिक औरतें नहीं रख सकता और जब अकबर उस से अधिक औरतें रखने लगा तो काजी ने उसे रोकने की कोशिश की। इस से नाराज होकर अकबर ने उस सुन्नी काजी को हटा कर शिया काजी को रख लिया क्योंकि शिया फिरके में असीमित और अस्थायी शादियों की इजाजत है , ऐसी शादियों को अरबी में “मुतअ” कहा जाता है।

अबुल फज़ल ने अकबर के हरम को इस तरह वर्णित किया है-
“अकबर के हरम में पांच हजार औरतें थीं और ये पांच हजार औरतें उसकी ३६ पत्नियों से अलग थीं। शहंशाह के महल के पास ही एक शराबखाना बनाया गया था। वहाँ इतनी वेश्याएं इकट्ठी हो गयीं कि उनकी गिनती करनी भी मुश्किल हो गयी। अगर कोई दरबारी किसी नयी लड़की को घर ले जाना चाहे तो उसको अकबर से आज्ञा लेनी पड़ती थी। कई बार सुन्दर लड़कियों को ले जाने के लिए लोगों में झगड़ा भी हो जाता था। एक बार अकबर ने खुद कुछ वेश्याओं को बुलाया और उनसे पूछा कि उनसे सबसे पहले भोग किसने किया”।

बैरम खान जो अकबर के पिता जैसा और संरक्षक था,
उसकी हत्या करके इसने उसकी पत्नी अर्थात अपनी माता के समान स्त्री से शादी की ।

इस्लामिक शरीयत के अनुसार किसी भी मुस्लिम राज्य में रहने वाले गैर मुस्लिमों को अपनी संपत्ति और स्त्रियों को छिनने से बचाने के लिए इसकी कीमत देनी पड़ती थी जिसे जजिया कहते थे। कुछ अकबर प्रेमी कहते हैं कि अकबर ने जजिया खत्म कर दिया था। लेकिन इस बात का इतिहास में एक जगह भी उल्लेख नहीं! केवल इतना है कि यह जजिया रणथम्भौर के लिए माफ करने की शर्त रखी गयी थी।

रणथम्भौर की सन्धि में बूंदी के सरदार को शाही हरम में औरतें भेजने की “रीति” से मुक्ति देने की बात लिखी गई थी। जिससे बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि अकबर ने युद्ध में हारे हुए हिन्दू सरदारों के परिवार की सर्वाधिक सुन्दर महिला को मांग लेने की एक परिपाटी बना रखी थीं और केवल बूंदी ही इस क्रूर रीति से बच पाया था।

यही कारण था की इन मुस्लिम सुल्तानों के काल में हिन्दू स्त्रियों के जौहर की आग में जलने की हजारों घटनाएँ हुईं

जवाहर लाल नेहरु ने अपनी पुस्तक ”डिस्कवरी ऑफ इण्डिया” में अकबर को ‘महान’ कहकर उसकी प्रशंसा की है। हमारे कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने भी अकबर को एक परोपकारी उदार, दयालु और धर्मनिरपेक्ष शासक बताया है।
अकबर के दादा बाबर का वंश तैमूरलंग से था और मातृपक्ष का संबंध चंगेज खां से था। इस प्रकार अकबर की नसों में एशिया की दो प्रसिद्ध आतंकी और खूनी जातियों, तुर्क और मंगोल के रक्त का सम्मिश्रण था। जिसके खानदान के सारे पूर्वज दुनिया के सबसे बड़े जल्लाद थे और अकबर के बाद भी जहाँगीर और औरंगजेब दुनिया के सबसे बड़े दरिन्दे थे तो ये बीच में महानता की पैदाईश कैसे हो गयी।

अकबर के जीवन पर शोध करने वाले इतिहासकार विंसेट स्मिथ ने साफ़ लिखा है की अकबर एक दुष्कर्मी, घृणित एवं नृशंश हत्याकांड करने वाला क्रूर शाशक था।
विन्सेंट स्मिथ ने किताब ही यहाँ से शुरू की है कि “अकबर भारत में एक विदेशी था. उसकी नसों में एक बूँद खून भी भारतीय नहीं था । अकबर मुग़ल से ज्यादा एक तुर्क था”।

चित्तौड़ की विजय के बाद अकबर ने कुछ फतहनामें प्रसारित करवाये थे। जिससे हिन्दुओं के प्रति उसकी गहन आन्तरिक घृणा प्रकाशित हो गई थी।

उनमें से एक फतहनामा पढ़िये-
”अल्लाह की खयाति बढ़े इसके लिए हमारे कर्तव्य परायण मुजाहिदीनों ने अपवित्र काफिरों को अपनी बिजली की तरह चमकीली कड़कड़ाती तलवारों द्वारा वध कर दिया। ”हमने अपना बहुमूल्य समय और अपनी शक्ति घिज़ा (जिहाद) में ही लगा दिया है और अल्लाह के सहयोग से काफिरों के अधीन बस्तियों, किलों, शहरों को विजय कर अपने अधीन कर लिया है, कृपालु अल्लाह उन्हें त्याग दे और उन सभी का विनाश कर दे। हमने पूजा स्थलों उसकी मूर्तियों को और काफिरों के अन्य स्थानों का विध्वंस कर दिया है।”
(फतहनामा-ई-चित्तौड़ मार्च १५८६,नई दिल्ली)

महाराणा प्रताप के विरुद्ध अकबर के अभियानों के लिए
सबसे बड़ा प्रेरक तत्व था इस्लामी जिहाद की भावना जो उसके अन्दर कूट-कूटकर भरी हुई थी।

अकबर के एक दरबारी इमाम अब्दुल कादिर बदाउनी ने अपने इतिहास अभिलेख, ‘मुन्तखाव-उत-तवारीख’ में लिखा था कि १५७६ में जब शाही फौजें राणाप्रताप के खिलाफ युद्ध के लिए अग्रसर हो रहीं थीं तो मैनें (बदाउनीने) ”युद्ध अभियान में शामिल होकर हिन्दुओं के रक्त से अपनी इस्लामी दाढ़ी को भिगोंकर शाहंशाह से भेंट की अनुमति के लिए प्रार्थना की।”मेरे व्यक्तित्व और जिहाद के प्रति मेरी निष्ठा भावना से अकबर इतना प्रसन्न हुआ कि उन्होनें प्रसन्न होकर मुझे मुठ्ठी भर सोने की मुहरें दे डालीं।” (मुन्तखाब-उत-तवारीख : अब्दुल कादिर बदाउनी, खण्ड II, पृष्ठ ३८३,अनुवाद वी. स्मिथ, अकबर दी ग्रेट मुगल, पृष्ठ १०८)

बदाउनी ने हल्दी घाटी के युद्ध में एक मनोरंजक घटना के बारे में लिखा था-
”हल्दी घाटी में जब युद्ध चल रहा था और अकबर की सेना से जुड़े राजपूत, और राणा प्रताप की सेना के राजपूत जब परस्पर युद्धरत थे और उनमें कौन किस ओर है, भेद कर पाना असम्भव हो रहा था, तब मैनें शाही फौज के अपने सेना नायक से पूछा कि वह किस पर गोली चलाये ताकि शत्रु ही मरे।
तब कमाण्डर आसफ खाँ ने उत्तर दिया कि यह जरूरी नहीं कि गोली किसको लगती है क्योंकि दोनों ओर से युद्ध करने वाले काफिर हैं, गोली जिसे भी लगेगी काफिर ही मरेगा, जिससे लाभ इस्लाम को ही होगा।”
(मुन्तखान-उत-तवारीख : अब्दुल कादिर बदाउनी,
खण्ड II,अनु अकबर दी ग्रेट मुगल : वी. स्मिथ पुनः मुद्रित १९६२; हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल, दी मुगल ऐम्पायर :आर. सी. मजूमदार, खण्ड VII, पृष्ठ १३२ तृतीय संस्करण)

जहाँगीर ने, अपनी जीवनी, ”तारीख-ई-सलीमशाही” में लिखा था कि ‘ ‘अकबर और जहाँगीर के शासन काल में पाँच से छः लाख की संख्या में हिन्दुओं का वध हुआ था।”
(तारीख-ई-सलीम शाही, अनु. प्राइस, पृष्ठ २२५-२६)

जून 1561- एटा जिले के (सकित परंगना) के 8 गावों की हिंदू जनता के विरुद्ध अकबर ने खुद एक आक्रमण का संचालन किया और परोख नाम के गाँव में मकानों में बंद करके १००० से ज़्यादा हिंदुओं को जिंदा जलवा दिया था।
कुछ इतिहासकारों के अनुसार उनके इस्लाम कबूल ना करने के कारण ही अकबर ने क्रुद्ध होकर ऐसा किया।

थानेश्वर में दो संप्रदायों कुरु और पुरी के बीच पूजा की जगह को लेकर विवाद चल रहा था. अकबर ने आदेश
दिया कि दोनों आपस में लड़ें और जीतने वाला जगह पर कब्ज़ा कर ले। उन मूर्ख लोगों ने आपस में ही अस्त्र शस्त्रों से लड़ाई शुरू कर दी। जब पुरी पक्ष जीतने लगा तो अकबर ने अपने सैनिकों को कुरु पक्ष की तरफ से लड़ने का आदेश दिया. और अंत में इसने दोनों ही तरफ के लोगों को अपने सैनिकों से मरवा डाला और फिर अकबर महान जोर से हंसा।

एक बार अकबर शाम के समय जल्दी सोकर उठ गया तो उसने देखा कि एक नौकर उसके बिस्तर के पास सो रहा है। इससे उसको इतना गुस्सा आया कि नौकर को मीनार से नीचे फिंकवा दिया।

अगस्त १६०० में अकबर की सेना ने असीरगढ़ का किला घेर लिया पर मामला बराबरी का था।विन्सेंट स्मिथ ने लिखा है कि अकबर ने एक अद्भुत तरीका सोचा। उसने किले के राजा मीरां बहादुर को संदेश भेजकर अपने सिर की कसम खाई कि उसे सुरक्षित वापस जाने देगा। जब मीरां शान्ति के नाम पर बाहर आया तो उसे अकबर के सामने सम्मान दिखाने के लिए तीन बार झुकने का आदेश दिया गया क्योंकि अकबर महान को यही पसंद था।
उसको अब पकड़ लिया गया और आज्ञा दी गयी कि अपने सेनापति को कहकर आत्मसमर्पण करवा दे। मीराँ के सेनापति ने इसे मानने से मना कर दिया और अपने लड़के को अकबर के पास यह पूछने भेजा कि उसने अपनी प्रतिज्ञा क्यों तोड़ी? अकबर ने उसके बच्चे से पूछा कि क्या तेरा पिता आत्मसमर्पण के लिए तैयार है? तब बालक ने कहा कि चाहे राजा को मार ही क्यों न डाला जाए उसका पिता समर्पण नहीं करेगा। यह सुनकर अकबर महान ने उस बालक को मार डालने का आदेश दिया। यह घटना अकबर की मृत्यु से पांच साल पहले की ही है।

हिन्दुस्तानी मुसलमानों को यह कह कर बेवकूफ बनाया जाता है कि अकबर ने इस्लाम की अच्छाइयों को पेश किया. असलियत यह है कि कुरआन के खिलाफ जाकर ३६ शादियाँ करना, शराब पीना, नशा करना, दूसरों से अपने आगे सजदा करवाना आदि इस्लाम के लिए हराम है और इसीलिए इसके नाम की मस्जिद भी हराम है।
अकबर स्वयं पैगम्बर बनना चाहता था इसलिए उसने अपना नया धर्म “दीन-ए-इलाही – ﺩﯾﻦ ﺍﻟﻬﯽ ” चलाया। जिसका एकमात्र उद्देश्य खुद की बड़ाई करवाना था। यहाँ तक कि मुसलमानों के कलमें में यह शब्द “अकबर खलीफतुल्लाह – ﺍﻛﺒﺮ ﺧﻠﻴﻔﺔ ﺍﻟﻠﻪ ” भी जुड़वा दिया था।
उसने लोगों को आदेश दिए कि आपस में अस्सलाम वालैकुम नहीं बल्कि “अल्लाह ओ अकबर” कहकर एक दूसरे का अभिवादन किया जाए। यही नहीं अकबर ने हिन्दुओं को गुमराह करने के लिए एक फर्जी उपनिषद् “अल्लोपनिषद” बनवाया था जिसमें अरबी और संस्कृत मिश्रित भाषा में मुहम्मद को अल्लाह का रसूल और अकबर को खलीफा बताया गया था। इस फर्जी उपनिषद् का उल्लेख महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में किया है।

उसके चाटुकारों ने इस धूर्तता को भी उसकी उदारता की तरह पेश किया। जबकि वास्तविकता ये है कि उस धर्म को मानने वाले अकबरनामा में लिखित कुल १८ लोगों में से केवल एक हिन्दू बीरबल था।

अकबर ने अपने को रूहानी ताकतों से भरपूर साबित करने के लिए कितने ही झूठ बोले। जैसे कि उसके पैरों की धुलाई करने से निकले गंदे पानी में अद्भुत ताकत है जो रोगों का इलाज कर सकता है। अकबर के पैरों का पानी लेने के लिए लोगों की भीड़ लगवाई जाती थी। उसके दरबारियों को तो इसलिए अकबर के नापाक पैर का चरणामृत पीना पड़ता था ताकि वह नाराज न हो जाए।
अकबर ने एक आदमी को केवल इसी काम पर रखा था कि वह उनको जहर दे सके जो लोग उसे पसंद नहीं।

अकबर महान ने न केवल कम भरोसेमंद लोगों का कतल
कराया बल्कि उनका भी कराया जो उसके भरोसे के आदमी थे जैसे- बैरम खान (अकबर का गुरु जिसे मारकर अकबर ने उसकी बीवी से निकाह कर लिया), जमन, असफ खान (इसका वित्त मंत्री), शाह मंसूर, मानसिंह, कामरान का बेटा, शेख अब्दुरनबी, मुइजुल मुल्क, हाजी इब्राहिम और बाकी सब जो इसे नापसंद थे। पूरी सूची स्मिथ की किताब में दी हुई है।

अकबर के चाटुकारों ने राजा विक्रमादित्य के दरबार की कहानियों के आधार पर उसके दरबार और नौ रत्नों की कहानी गढ़ी। पर असलियत यह है कि अकबर अपने
सब दरबारियों को मूर्ख समझता था। उसने स्वयं कहा था कि वह अल्लाह का शुक्रगुजार है कि उसको योग्य दरबारी नहीं मिले वरना लोग सोचते कि अकबर का राज उसके दरबारी चलाते हैं वह खुद नहीं।

अकबरनामा के एक उल्लेख से स्पष्ट हो जाता है कि उसके हिन्दू दरबारियों का प्रायः अपमान हुआ करता था। ग्वालियर में जन्में संगीत सम्राट रामतनु पाण्डेय उर्फ तानसेन की तारीफ करते-करते मुस्लिम दरबारी उसके मुँह में चबाया हुआ पान ठूँस देते थे। भगवन्त दास और दसवंत ने सम्भवत: इसी लिए आत्महत्या कर ली थी।

प्रसिद्ध नवरत्न टोडरमल अकबर की लूट का हिसाब करता था। इसका काम था जजिया न देने वालों की औरतों को हरम का रास्ता दिखाना। वफादार होने के बावजूद अकबर ने एक दिन क्रुद्ध होकर उसकी पूजा की मूर्तियाँ तुड़वा दी।
जिन्दगी भर अकबर की गुलामी करने के बाद टोडरमल ने अपने जीवन के आखिरी समय में अपनी गलती मान कर दरबार से इस्तीफा दे दिया और अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए प्राण त्यागने की इच्छा से वाराणसी होते हुए हरिद्वार चला गया और वहीं मरा।

लेखक और नवरत्न अबुल फजल को स्मिथ ने अकबर का अव्वल दर्जे का निर्लज्ज चाटुकार बताया। बाद में जहाँगीर ने इसे मार डाला।

फैजी नामक रत्न असल में एक साधारण सा कवि था जिसकी कलम अपने शहंशाह को प्रसन्न करने के लिए ही चलती थी।

बीरबल शर्मनाक तरीके से एक लड़ाई में मारा गया। बीरबल अकबर के किस्से असल में मन बहलाव की बातें हैं जिनका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं। ध्यान रहे
कि ऐसी कहानियाँ दक्षिण भारत में तेनालीराम के नाम से
भी प्रचलित हैं।

एक और रत्न शाह मंसूर दूसरे रत्न अबुल फजल के हाथों अकबर के आदेश पर मार डाला गया ।

मान सिंह जो देश में पैदा हुआ सबसे नीच गद्दार था, ने अपनी बेटी तो अकबर को दी ही जागीर के लालच में कई और राजपूत राजकुमारियों को तुर्क हरम में पहुँचाया। बाद में जहांगीर ने इसी मान सिंह की पोती को भी अपने हरम में खींच लिया।

मानसिंह ने पूरे राजपूताने के गौरव को कलंकित किया था। यहाँ तक कि उसे अपना आवास आगरा में बनाना पड़ा क्योंकि वो राजस्थान में मुँह दिखाने के लायक नहीं था। यही मानसिंह जब संत तुलसीदास से मिलने गया तो अकबर ने इस पर गद्दारी का संदेह कर दूध में जहर देकर मरवा डाला और इसके पिता भगवान दास ने लज्जित होकर आत्महत्या कर ली।

इन नवरत्नों को अपनी बीवियां, लडकियां, बहनें तो अकबर की खिदमत में भेजनी पड़ती ही थीं ताकि बादशाह सलामत उनको भी सलामत रखें, और साथ ही अकबर महान के पैरों पर डाला गया पानी भी इनको पीना पड़ता था जैसा कि ऊपर बताया गया है। अकबर शराब और अफीम का इतना शौक़ीन था, कि अधिकतर समय नशे में धुत रहता था।

अकबर के दो बच्चे नशाखोरी की आदत के चलते अल्लाह को प्यारे हो गये।

हमारे फिल्मकार अकबर को सुन्दर और रोबीला दिखाने के लिए रितिक रोशन जैसे अभिनेताओं को फिल्मों में पेश करते हैं परन्तु विन्सेंट स्मिथ अकबर के बारे में लिखते हैं-
“अकबर एक औसत दर्जे की लम्बाई का था। उसके बाएं पैर में लंगड़ापन था। उसका सिर अपने दायें कंधे की तरफ झुका रहता था। उसकी नाक छोटी थी जिसकी हड्डी बाहर को निकली हुई थी। उसके नाक के नथुने ऐसे दिखते थे जैसे वो गुस्से में हो। आधे मटर के दाने के बराबर एक मस्सा उसके होंठ और नथुनों को मिलाता था।

अकबर का दरबारी लिखता है कि अकबर ने इतनी ज्यादा पीनी शुरू कर दी थी कि वह मेहमानों से बात
करता करता भी नींद में गिर पड़ता था। वह जब ज्यादा पी लेता था तो आपे से बाहर हो जाता था और पागलों जैसी हरकतें करने लगता।

अकबर महान के खुद के पुत्र जहाँगीर ने लिखा है कि अकबर कुछ भी लिखना पढ़ना नहीं जानता था पर यह दिखाता था कि वह बड़ा भारी विद्वान है।

अकबर ने एक ईसाई पुजारी को एक रूसी गुलाम का पूरा परिवार भेंट में दिया। इससे पता चलता है कि अकबर गुलाम रखता था और उन्हें वस्तु की तरह भेंट में दिया और लिया करता था।

कंधार में एक बार अकबर ने बहुत से लोगों को गुलाम बनाया क्योंकि उन्होंने १५८१-८२ में इसकी किसी नीति का विरोध किया था। बाद में इन गुलामों को मंडी में बेच कर घोड़े खरीदे गए ।

अकबर बहुत नए तरीकों से गुलाम बनाता था। उसके आदमी किसी भी घोड़े के सिर पर एक फूल रख देते थे। फिर बादशाह की आज्ञा से उस घोड़े के मालिक के सामने दो विकल्प रखे जाते थे, या तो वह अपने घोड़े को भूल जाये, या अकबर की वित्तीय गुलामी क़ुबूल करे।

जब अकबर मरा था तो उसके पास दो करोड़ से ज्यादा अशर्फियाँ केवल आगरे के किले में थीं। इसी तरह के और
खजाने छह और जगह पर भी थे। इसके बावजूद भी उसने १५९५-१५९९ की भयानक भुखमरी के समय एक सिक्का भी देश की सहायता में खर्च नहीं किया।

अकबर के सभी धर्म के सम्मान करने का सबसे बड़ा सबूत-
अकबर ने गंगा,यमुना,सरस्वती के संगम का तीर्थनगर “प्रयागराज” जो एक काफिर नाम था को बदलकर इलाहाबाद रख दिया था। वहाँ गंगा के तटों पर रहने वाली सारी आबादी का क़त्ल करवा दिया और सब इमारतें गिरा दीं क्योंकि जब उसने इस शहर को जीता तो वहाँ की हिन्दू जनता ने उसका इस्तकबाल नहीं किया। यही कारण है कि प्रयागराज के तटों पर कोई पुरानी इमारत नहीं है। अकबर ने हिन्दू राजाओं द्वारा निर्मित संगम प्रयाग के किनारे के सारे घाट तुड़वा डाले थे। आज भी वो सारे साक्ष्य वहाँ मौजूद हैं।

२८ फरवरी १५८० को गोवा से एक पुर्तगाली मिशन अकबर के पास पंहुचा और उसे बाइबल भेंट की जिसे इसने बिना खोले ही वापस कर दिया।

4 अगस्त १५८२ को इस्लाम को अस्वीकार करने के कारण सूरत के २ ईसाई युवकों को अकबर ने अपने हाथों से क़त्ल किया था जबकि इसाईयों ने इन दोनों युवकों को छोड़ने के लिए १००० सोने के सिक्कों का सौदा किया था। लेकिन उसने क़त्ल ज्यादा सही समझा । सन् 1582 में बीस मासूम बच्चों पर भाषा परीक्षण किया और ऐसे घर में रखा जहाँ किसी भी प्रकार की आवाज़ न जाए और उन मासूम बच्चों की ज़िंदगी बर्बाद कर दी वो गूंगे होकर मर गये । यही परीक्षण दोबारा 1589 में बारह बच्चों पर किया ।

सन् 1567 में नगर कोट को जीत कर कांगड़ा देवी मंदिर की मूर्ति को खण्डित की और लूट लिया फिर गायों की हत्या कर के गौ रक्त को जूतों में भरकर मंदिर की प्राचीरों पर छाप लगाई ।

जैन संत हरिविजय के समय सन् 1583-85 को जजिया कर और गौ हत्या पर पाबंदी लगाने की झूठी घोषणा की जिस पर कभी अमल नहीं हुआ।

एक अंग्रेज रूडोल्फ ने अकबर की घोर निंदा की।
कर्नल टोड लिखते हैं कि अकबर ने एकलिंग की मूर्ति तोड़ डाली और उस स्थान पर नमाज पढ़ी।

1587 में जनता का धन लूटने और अपने खिलाफ हो रहे विरोधों को ख़त्म करने के लिए अकबर ने एक आदेश पारित किया कि जो भी उससे मिलना चाहेगा उसको अपनी उम्र के बराबर मुद्राएँ उसको भेंट में देनी पड़ेगी।

जीवन भर इससे युद्ध करने वाले महान महाराणा प्रताप जी से अंत में इसने खुद ही हार मान ली थी यही कारण है कि अकबर के बार बार निवेदन करने पर भी जीवन भर जहाँगीर केवल ये बहाना करके महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह से युद्ध करने नहीं गया की उसके पास हथियारों और सैनिकों की कमी है..जबकि असलियत ये थी की उसको अपने बाप का बुरा हश्र याद था।

विन्सेंट स्मिथ के अनुसार अकबर ने मुजफ्फर शाह को हाथी से कुचलवाया। हमजबान की जबान ही कटवा डाली। मसूद हुसैन मिर्ज़ा की आँखें सीकर बंद कर दी गयीं। उसके 300 साथी उसके सामने लाये गए और उनके चेहरों पर अजीबोगरीब तरीकों से गधों, भेड़ों और कुत्तों की खालें डाल कर काट डाला गया।

मुग़ल आक्रमणकारी थे यह सिद्ध हो चुका है। मुगल दरबार तुर्क एवं ईरानी शक्ल ले चुका था। कभी भारतीय न बन सका। भारतीय राजाओं ने लगातार संघर्ष कर मुगल साम्राज्य को कभी स्थिर नहीं होने दिया।

courtesy: https://pparihar.com

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NOT EVEN A SINGLE MUSLIM VOTED FOR BJP IN UP

There Is No Evidence That A Single Muslim Voted For The BJP In UP

Claims to the contrary aren’t backed by data.

HINDUSTAN TIMES VIA GETTY IMAGES

A lot has been said about Muslim support for the BJP in Uttar Pradesh given the scale of its victory, but none of this is borne out by the numbers. What can we say about how Muslims voted?

1. There is no evidence that Muslims voted for the BJP.

Despite political statements and some stories in the media, there is just no evidence for this. There is not a single constituency where the BJP’s voteshare exceeds that of the Hindu population of that constituency.

Sahibabad is the only constituency where it’s close–the winning BJP candidate, Sunil Kumar Sharma, won 61% of the votes in the constituency, while the share of Hindu population in the constituency is between 60 and 65%. Data on voteshares and the Hindu and Muslim population come from Datanet India, which compiled the data from the Election Commission of India and the Census of India respectively.

In that constituency, the Congress and BSP candidates between them got 36% of the votes; the Muslim population of that constituency is between 35 and 40%.

2. BJP candidates winning from a large number of seats with a significant Muslim population does not mean that Muslims voted for the BJP.

In a first-past-the-post system, candidates typically need between 30-35% of the voteshare in a constituency to win. In this election, BJP candidates did particularly well; the median voteshare of winning BJP candidates was a whopping 43.64%.

 Yet what most forget is that even in UP, there are few Muslim-majority constituencies. There are only seven constituencies in UP with more than 50% Muslims (meaning that a party can win the state without a single Muslim vote)–and the Samajwadi Party won all of these. The BJP’s winning streak essentially begins when the Muslim population goes below 45%.

3. Strategic voting failed

Of 82 constituencies with more than 30% Muslims, the BJP won 62. But it appears that the Muslim vote was split between the SP and the BSP–in 60 of these constituencies, their combined voteshare was higher than that of the Muslim population. Given that in a majority of these constituencies both or one of the SP/ INC and BSP had a Muslim candidate, it is very likely that the Muslim vote got split between the SP and the BSP.

So rather than strategically voting to keep the BJP out, it could be argued that UP’s Muslims actually failed at strategic voting.
read more at http://www.huffingtonpost.in/2017/03/14/there-is-no-evidence-that-a-single-muslim-voted-for-the-bjp-in-u/
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WHAT HINDUISM IS LACKING

There seems to be some “defect” in Hinduism, because worldwide, it is clearly not as respected as Christianity and Islam. Hindus struggle to get a fair representation for Hinduism in the media or in textbooks whether abroad or even at home.

This is hard to understand, because Hinduism has the best philosophical basis of all and is in tune with modern nuclear science. It acknowledges that the essence in all is consciousness (spirit) and shows practical ways how to realize this one spirit as true. It is therefore even in tune with the ever growing tribe in the west who say “I am spiritual, not religious”.

When India was ruled by Christians and Muslims, it was understandable that those in power promoted their religion as the best and denigrated the ‘primitive native religion’. But today, when there is an open market of ideas, why is Hinduism still getting a rough and very unfair deal when it actually deserved the highest respect, and how can this be changed?

One fine morning I realized what Hinduism is “lacking” and how this could be rectified. Hinduism would finally be on the same footing as Christianity and Islam.

It is simple.

The ancient rishis had left out only one important sentence after passing on their insights. This one sentence obviously makes all the difference whether a religion is respected, powerful and keeps gaining followers or whether it is demeaned, ridiculed and loses followers.

This sentence is:

If you don’t believe what we tell you, the supreme Divinity will throw you for all eternity into hellfire.

Let’s imagine Maharishi Vyasa, after compiling the Vedas, had added this sentence: “Whoever does not believe in the Vedas as the only truth, will be thrown for all eternity into hellfire by Brahman himself.”

Or after writing the Mahabharata, if he had added “Whosoever does not believe that Sri Krishna is the only true mediator between man and Brahman, will burn eternally in hell”.

Or if Valmiki, after writing down the teaching of Guru Vashishta to Prince Rama, had added that Vashishta alone is the true guru and whoever does not believe it will end up in hell.

Or even today, if Mata Amritanandamayi for example, who has several miracles to her credit and an unparalleled outflow of love, would claim that she is the only indigenous daughter of god and who does not believe it, will be thrown into hellfire forever…

If this had happened, Hinduism would not be the underdog. It would be on the same level with the respected religions. In fact, the newcomer religions probably had little chance to come up, because Hinduism was there ages before them and it could have easily declared those newcomers as inexcusable heretics that need to be put to death.

In fact, not all is lost. Since the Bible and the Quran were written down after Jesus and Mohamed had died and several earlier versions were discarded, maybe Hindus still could amend their sacred texts?

In case it is not clear, of course I am not serious.

But it struck me one morning that the respect for dogmatic religions is based on irrationality and how easily it could be corrected if Hindus would chose to be as irrational and if they would back up –this is an important ingredient – their irrationality with blasphemy laws. Hindus could take part in the one-upmanship of “only we are right” and threaten those who dare to dissent with death.

Actually, it is not so much irrationality but cunningness, because those who made those claims of eternal hell for outsiders in all likelihood did not believe it themselves. It could not possibly have come from Divine inspiration but is driven by worldly power.

The rishis in contrast were truthful. They were not cunning or irrational, and Indians – all Indians – can be proud of them.

But pride is not enough. Present day Indians need to take care that this irrationality does not eat into their society because it will lead to its downfall. It is not difficult to find examples for such societies.

Dharma finds expression through people who stand up for it and if necessary fight for it. Adharmic forces need to be called out and challenged.

It seems, on this world stage, a Mahabharata war is always on, in all ages. Yet ultimately, at a higher level beyond the dichotomy of good and evil, all are absorbed in the one eternal Brahman from whom all has originated.

There won’t be a huge cauldron of fire where billions of human beings will burn for all eternity. This claim by both Christianity and Islam does not deserve respect. It deserves ridicule.

By Maria Wirth

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THE TRUE HINDU GREATNESS-Koenraad Elst

Hindus make bold to be the inheritors of a great and exceptional civilization. And they are.Indeed, a wider recognition of this ancestral greatness would solve a number of contemporary problems Hinduism faces.

Separatism, the phenomenon that Hindu sects declare that they are non-Hindu and back-project that they never have been Hindus, is largely due to the bad reputation of Hinduism. Nobody wants to stay on a sinking ship (especially not the rats, the true nature of most defectors). Hinduism is slandered as “caste, wholly caste and nothing but caste”, and when at all it is admitted to be something else on top, it must be widow self-immolation, child marriage, dowry murders, nowadays the rapes that make headlines, and other human rights violations.

Hindus make bold to be the inheritors of a great and exceptional civilization.

Moreover, it is seen as superstitious, incoherent, flaky, and worst of all, weak. Hinduism has an intensely bad image, and that is why the Jains, Buddhists, Lingayats, Sikhs, Arya Samajis, Ramakrishna Mission and others insist that they are not Hindus, while another category of malcontents defect by converting to Christianity or Islam.

The Hindu territory has constantly been shrinking for more than a thousand years: Kabul, most of Southeast Asia, Pakistan, Bangladesh, de facto also Kashmir and parts of the Northeast, these have all been lost. But the conceptual domain of “Hindu” has also been shrinking. Originally, Muslim invaders introduced the term as meaning: all Indian Pagans (non-Abrahamics), whether Buddhists, Jains, tribals, low-castes, high-castes, and by implication also younger sects like Virashaivism, Sikhism, the Arya Samaj or the Ramakrishna Mission.

The insistence by many castes that they are “not Hindus” stems from two circumstances: the very negative reputation of Hinduism, contrasting with its fair name in de 19th century; and the fogginess around the definition of “Hinduism”, only aggravated in recent decades by a deliberate manipulation of the word’s meaning.

After sketching some details of this phenomenon, we proceed to show that a correct assessment of the basic texts and the history of Hinduism would largely remedy both the bad name of Hinduism and the shifting sands of the term’s meaning. It may sometimes be diplomatically wise to speak of “Buddhists and Hindus” or “Hindus and Sikhs”, but the scholarly fact to be clearly realized and kept in mind is that the sect founders Shakyamuni Buddha and Guru Nanak never meant to break away from Hinduism, anymore than Shankara did when he founded his Dashanami monastic order, Hindu par excellence.

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Yet, Hindu civilization has everything to make its scions proud. If this greatness were highlighted rather than its real and imagined shortcomings, the defecting sects would eagerly come back. Those Sikhs who militated for Khalistan only yesterday, will turn around and shout: “Sikhs are Hindus”, or rather: “We Sikhs are more Hindu than you!”

Consider for instance the Vedic seers. Mind you, historically, “Hindu” is every Indian Pagan, i.e. every non-Christian and non-Muslim Indian. This implies that it includes many more people and more traditions than the strictly Vedic lineage, to which a certain hostile discourse tries to narrow “Hinduism” down. But even this much-maligned Vedic lineage has given the world enough to make all Hindus proud.

First of all, we have their praiseworthy choice of what things notto do.  The Vedic seers did not invent fairy-tales about their tradition being eternal and God-given. Whereas the Quran and the Biblical Ten Commandments are in the form of God addressing man, the Vedic hymns are more truthfully in the form of men addressing the gods.

I am aware that some Hindus try to understand the Vedas as a kind of Quran, eternal and revealed. They like to crawl under the heavy weight of scriptures ascribed to a divine author, showing the lack of self-understanding common in this age of degeneracy of Hinduism.

Fortunately, the Vedic seers knew better: they walked upright and composed those scriptures themselves. The Vedas were not created by a superhuman source and then memorized by dumb and uncreative human beings; they were created by skilful and understanding human beings, the ancestors of contemporary Hindu civilization.

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And then there are the things they did do. First of all, they created great poetry using elaborate metaphors, crafty verse forms and a unique system of memorization. Hindu society set apart a class whose job it was to memorize and pass on the tradition, genealogies and literature.

Vedic recitations today are deemed, even by hostile Indologists, as undeniably a kind of tape-recording of the original recitation thousands of years ago. It is this class of reciters that nowadays comes in for the harshest criticism. All the separatist sects invariably flaunt an anti-Brahmin hate discourse.

They thereby prove they don’t value the transmission of knowledge. In their rants that “the Brahmins monopolized knowledge”, they seem not to care about the “knowledge” part, nor do they busy themselves with acquiring or transmitting this knowledge.

To be sure, inertia and the psychological effect of being honoured by society caused some pride and smugness among the less meritorious members of the Brahmin class, a human phenomenon known in societies the world over. But the merits of this class, and especially of the society that set it apart, are unique.

Next, consider the insights captured in the literature they transmitted. Many great ideas that were to come in full bloom in later philosophies of India, East Asia, and more recently the West, already existed in germ in the Vedic hymns thousands of years ago.

Originally, Muslim invaders introduced the term as meaning: all Indian Pagans (non-Abrahamics), whether Buddhists, Jains, tribals, low-castes, high-castes, and by implication also younger sects like Virashaivism, Sikhism, the Arya Samaj or the Ramakrishna Mission

.

Thus, the correspondence between microcosmos and macrocosmos, between man and universe; the identity of man with the intelligence of the sun (so’ham); or the vibratory nature of reality (aum), still central also in Buddhism (om namo amituo fuom mani padme hum) and in Sikhism (omkar), are already themes in Vedic poetry.

Such elementary concepts as the division of the year in 12 and 360, and such profundities as the monistic unity underlying the plurality of gods, or the distinction between the ordinary self acting and the real Self merely observing, are all present in a single Vedic hymn – ideas to which entire schools of philosophy are mere commentaries.

Later, the doctrine of the Self was explicitated by seers like Yajnavalkya, who is up there with Plato as an ideas man next to whom a whole philosophical tradition is but a series of footnotes. Even the Buddhist no-Self doctrine, which spread around Asia, can only be comprehended by presupposing the concept of the Self.

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The seers’ pluralistic outlook is not equally exceptional, at least not when compared with Chinese or ancient Greek worldviews,– but nowadays the majority of mankind is in thrall to two religions (the Religion of Love and the Religion of Peace) that believe in suppressing pluralism and claiming the sole truth for themselves.

Against their narrow-minded exclusivism, the Hindu tradition offers the solution. Inside and outside the Vedas, almost everywhere in India, we find a religiosity that makes no truth claims about God. The devotional rituals practised in all temples, before sacred trees or in sacred groves, simply express awe for the sacred, the most fundamental and universal layer of all religions.

Secularists advocate superficiality and philosophical illiteracy, which is now having its effects on India’s population. A rediscovery of the real treasures of Hindu tradition will gladden the hearts of all those who can call themselves its inheritors. Say with pride: we are Hindus!

(Published in Prabodhan, the book edited by Prof. Saradindu Mukherji and made public at the World Hindu Congress, Delhi, 21-23 November 2014)

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O SHAMLESS HINDUS STOP GLORIFYING TERRORIST AKBAR,BYCOTT “JODHA AKBAR”

BALAJI TELEFILMS: STOP THE SERIAL JODHA AKBAR

Marriage of Jodhabai with Akbar is a highly humiliating episode in the history of Hindus–but instead of feeling humiliation, majority of Hindus appear to celebrate that cowardice episode. The film Jodha Akbar was made by Hindu producer, director, actor, actress, etc to portray, glamorize and praise  terrorist Akbar as a great person.Millions of shameless and idiot Hindu/Sikh/Jain/Buddhist viewers watched and praised this film. Please note that neither the producing team nor the viewers were forced by any Muslim to do so. They all did so just their attitude of licking the feet of Muslims even after most educated Hindus roughly knowing how tyrant, wicked and barbaric Akbar and other Muslim rulers were. After watching such films and serials, Hindus consider Muslims great. They don’t hesitate in praising Muslims and marrying their sisters, daughters, etc with Muslims. Thousands of such Hindu (includes all religions of Indian origin such as Sikhism, Buddhism, Jain, etc) girls marry with Muslims every year and their children become 100% hardcore Muslims who would contribute to Islamic jihad and become the enemy of Hindus and entire mankind. But, no Hindu intellectual or religious leader has wisdom and courage to speak against this shamelessness and foolishness. and Indian educated class appreciating highly wicked Muslims ruler like Akbar, Tipu Sultan, etc in books, stories, poetry, films, speeches, etc and majority of Indians liking this, then isn’t it the slave-mentality of Indian Hindus?

No Muslim forced them to make this film. This humiliating film was watched by millions of Hindus without any feel of shame. The idiot Ekta Kapoor of BalaJi Tele films is now telecasting a mega serial named Jodha Akbar on Zee TV to portray Akbar further great. Again this serial will be watched by millions of Hindus without any feel of shame. The DNA of the Hindus is corrupted with foolishness, shamelessness and cowardice

The Rajput Community is strongly opposing the serial named JODHA-AKBAR. This serial is based on the fake story which had no strong evidence. It is based on some baseless and imaginary literature. The eminent historians hadn’t proved it. Rajputs had shaded their blood to protect the motherland from the foreign invaders. This serial dishonours our pride so it is our birth right to oppose it. We request you on the behalf of Rajput community and the Rajput organization to stop making and broadcasting this serial. Rajput community is one of the major community in this Nation and so their feelings should be regarded and respected. The warrior race couldn’t bear the distorting with their history.

It has been shown in the serial that Rajput women are sitting next to Akbar and their husbands are threatened with life by holding swords over their heads. These Rajput kings are given a choice to keep either their wives or life when they choose life over their wives. Thus the producers have indulged in grave insult of Rajput women. (The true history is that most of the Rajput kings fought against cruel Muslim regime and thousands of Rajput women jumped into fire to save their dignity, but by distorting history, the producers, director, writer, actors have insulted Hindus. This will also teach wrong pro-Muslim history to future generations of Hindus demoralizing them. Can there be any greater loss caused to Dharma than this? – Editor, Dainik Sanatan Prabhat) There are even other incidents in this serial where Rajput kings are insulted.

Without knowing the history, producer Ekata Kapur and ZEE TV channel have misled people by showing wrong things without taking permission of Hindus or Rajputs; therefore, the people of this community are enraged. ABKM has said that ZEE TV channel has started such controversial serial only to increase its TRP; therefore, telecast of such controversial serial should be stopped immediately else, the Rajput-Kshatriya community will stop it. (Such organization with devout Hindus is an ideal example for Hindus. Owing to such organizations, the respect for Dharma still preserved amongst Hindus. All Hindus should follow the example of this organization and extend their support !

Secularists’ have taken it upon themselves to prove their bleeding hearts liberal credentials. Secularists are the soldiers for the “less powerful” (religious, economic, caste, region, etc.). That necessarily means that they are not soldiers of the TRUTH .When they advocate for minorities specially Muslims, they necessarily begin compromising on absolutely neutral truth. what is interesting is that they does not understand that after 65 years of disastrous, immoral, incompetent Congress rule, in a nation with weak constitutional protections for the opposition (talk to a constitutional expert – don’t just apply your lay impression – India has a very lopsided weak democracy), it is the right of center that has been the underdog all along.

Secularists are the soldiers for the minorities and will not raise voice for the majority even when they have legitimate grievances with the minorities. That is why we see ridiculously contorted arguments, nonsensical logical chains of inference in their writings, debates on TV channels. Those are just examples of their cognitive dissonance. Their brains are struggling to reconcile their bias with the facts, and it finds it easier to distort the facts than to know the unknown bias. Like a horse, with blinders, unable to see behind its arse.

See the secular credentials of most respected Mughal ruler AKBAR.Taking a thousand girls’ virginity just for the sake of one’s entertainment is acceptable, being civilized and is not any destruction to a woman’s soul?? Is it not a sexual violence?? What civilization do you belong to?? Does your civilization allow deflowering a thousand women??? If not, then you may now consider yourself as an OUTCAST!!

Only a TRULY patriarchal idiota who doesn’t even know his mind’s biases could condone the treatment of women as some kind of flowering plants that “was just deflowered, not destroyed”.

What an idiocy. Akbar was very cruel. And yes he was a sexual predator. We do not think those virgins slept with him at their own free will. They were raped against their wishes. Why not calls spade a spade. If Chengiz Khan is rapist then so is Akbar. And these Mughal were in fact bastards fathered by Chengiz Khan when he was raping Afghanistan. So genes might be responsible. Is that the reason Pakistan and North India are so unsafe for women? Akbar’s Aulad on rampage indeed?
Akbar was invader. He was invader. He was not Indian. He subjugated Indians. We tell these liberals to not be hypocrite. Do not blame for British if you do not want to blame Mughal invaders. Let us not forget what great Naipaul had told us… British really liberated Indians and Hindus from corrupt and biased Islamic rulers. Those who condemn British rule are anti Hindu and anti India. I completely agree. Hindus have to thank the British for inadvertently uniting their land, freeing them from Islamic rule, and bringing the age of modern science into their land.

Read Akbar carefully! How Akbar would hunt (with tens of thousands of men on foot and horses driving the jungle animals into an ever-shrinking area, with Akbar finally coming in as

police do in Hindi movies, and with thousands of animals slaughtered in one go); drink (he would become a more than mild case of temporary mental derangement, sometimes even roaming around his camp crying/cursing in a drunken stupor, with his ministers and generals
wondering when he might “descend down”); use “gaanjaa”/”afoo”/”charas”
(aplenty, on a daily basis), etc.Imagine a Chinese-looking powerful hooligan(goonda) who, having had his daily fix of “gaanjaa” and quite some wine, as returning from one of those gory hunts and then, inching closer to you for your deflowering —with hundreds of his security
men making it impossible for you to even think of running. Imagine looking into his eyes. Imagine his smell, a mix of the fragrances used in Hindu AND Muslim AND Parsi ETC. temples + fragrances used in his royal court + smell of wine + smell of “gaanjaa” + smell of the roast
wild animal he just had before passing by your village… … How romantic that sounds, no? Any man who ruins the life of 1000 women citizens of his land is a criminal and barbarian worthy of the greatest punishments possible. Any man who is illiterate is by definition uncivilized. We must disprove entire hypothesis with just these details. We are humans for a reason – our brains. Otherwise, the name for the species is APE.

Shameless Hindus, who watch Jodha-Akbar serial which glorifies Hindu hater Cruel Akbar and insults Hindus, are worthy of getting killed by Terrorists! O Hindus, boycott ‘Jodha Akbar’ serial.

 

 

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WHY DO WE HAVE AN AURANGZEB ROAD IN NEW DELHI?

Why do we have an Aurangzeb Road in New Delhi?

Aurangzeb’s name is anathema in Indian history because it connotes the very apex of vice, venom and villainy, and torture, treachery and tyranny. None of Aurangzeb’s atrocities were secular, even if that be any consolation. They were carried out methodically, ruthlessly in the name of Islam for the glory (sic) of the Muslims. Ascending the throne at the crest of 950 years of alien rule in India, Aurangzeb, the sixth Mughal emperor, is a byword for Muslim misrule and misdeeds carried to a climax.” In my childhood I remember even the Government documents also used to mention that Tipu Sultan committed umpteen atrocities including forced circumcision in an around Srirangapattanam. But off late different Political parties started competition for secularism. Today he is hailed as hero. I guess it is the same case with Aurangzeb – The Hero, The most devout emperor! Going by the same standard it is not a wonder if our brothers openly celebrate centenaries lauding the achievement of Dawood Ibrahim. There will be stories that he was the most secular because he employed Hindus and ungrateful Hindus stabbed him in the back by leaving him after the 1992 Blasts. Then goes the adventurous story of how Mr. Dawood managed to escape to Pakistan and served the humanity (Read Ummah) Aurangzeb projecting him as a ruler who ruled his people equally irrespective of their religion, caste, etc. This example exactly suits to Hitler of Mughal times Aurangzeb (the evil incarnate).Aurangzeb had done more cruelties against Hindus than favours during his reign. If you u want Hindus to believe that Aurangzeb was actually secular and he destroyed the temples like Kashi Vishwanath for it was dishonoured. . Then it is like making the Iraqis believe that George Bush of America was actually a benevolent person and he is developing their country. The horrors of Islamic rule in India till the advent of British rule in India are totally ingrained in the minds of Hindus. You cannot change the mindset of Hindus who know that Temur, Gazani, Ghori, Babur and Moguls Empire stood only for religious expansion of Islam, conversions, killing, looting, and pillaging, raping, destruction of temples. If Aurangzeb was innocent in Kashi vishwanath temple destruction, then you people can also make Hitler a noble leader, telling that Hitler was not responsible for the killing of 60 million Jews but he gave employment to them in concentration camps which even Jews hailed as abodes of heaven Aurangzeb destroyed temples because he was zealot and anti Hindus. Aurangzeb was responsible for Hindus Kashmiri pundits’ massacre and the subsequent rise of Hindu Sikhs. The insulting taxes had a sinister design to weaken Hindus strength and induce conversions, which resulted in the rise of Marathas, the Jats, under Chhatrasal.  In the history of India there was hardly a more brutal, fanatic and Hindu killer Moguls emperor than Aurangzeb.

Yet his memory is “honoured” in the Indian coolie colony of bandit and bastard Nehru who took the pride out of the Hindu collective body.Here is a letter by someone who has recently been to broken Bharat’s capital, New Delhi. One is shocked to learn that there is a road called “Aurangzeb Road”. had the British and the Jews been at the dog’s level of self-esteem like the Hindus of partitioned India, there would have been one road in London called “Hitler Road” and one road in Tel Aviv called “Marshal Goering road”.
But the name is based on Aurangzeb who is known for his brutality and oppression of peoples especially his oppression of non-Muslims.
So in that case shouldn’t it be changed? Yet in New Delhi we have Aurangzeb Road, a constant reminder of the… When Aurangzeb came in power he destroyed temples and imposed taxes on Hindus which was not the case before in the Mughal reign. So did the Britishers us Works of Atheist Nehru and Communists in India have done enough damage to our pride. This could be one of those steps taken by them to portray Indian history differently. Aurangzeb torched thousands of temples and one of the major tyrants responsible for ethnic cleansing in India. Of course such direct analysis will never be presented in India because it becomes politically incorrect to educate the masses about the truth.  Shivaji waged wars to counter of the cultural erosion and genocide caused by Aurangzeb. I wonder we might have a Afzal Street to house Home Minister and Kasab street to house Rashtrapathi in future. I have been thinking of the same for a long time. In Aurangzeb’s time, Hindus were not allowed to ride on horses. They had to walk miles to pay the jizya tax. They were not allowed to sit down while waiting to pay the tax. Many poor Hindus only escape was to become Muslims.
You won’t find roads named after Hitler.
Tipu Sultan, St. Xavier is other names honored in Hindu-majority India. Recent name include so-called Mother Teresa.Aurangzeb was a secular ruler like Tipu Sultan. Tipu Sultan did his best to convert all non-believers (in what he believed) into “the religion of peace and equality” (trademark). He only destroyed Hindu temples and raised as many mosques as possible. Hence, Tipu is secular. In fact, In Karnataka we have many monuments, roads and institutions named after Tipu Sultan. He is also referred to as a freedom fighter in our history text books. Aurangzeb has not been lucky enough to get the title of ‘freedom fighter’

Aurangzeb built a number of mosques on destroyed temples, including Kashi Vishwanath, one of the most sacred places for Hindus. Other Hindu sacred places within his reach too suffered destruction with mosques built on them. A few examples: Krishna’s birth temple in Mathura, the rebuilt Somnath temple on the coast of Gujarat, the Vishnu temple replaced with the Aalamgir mosque now overlooking Benares, and the Treta-ke-Thakur temple in Ayodhya. The number of temples destroyed by Aurangzeb is counted in four, if not five, figures. Aurangzeb did not stop at destroying temples; their users were also wiped out.

Muslims suffered as much as Hindus: 90% of today’s Indian Muslims should know that their forefathers were converted by force under Aurangzeb. Even his own brother, Dara Shikoh, was executed for taking an interest in Hindu religion.

Yet, one has just to go through Aurangzeb’s own firmans (edicts), which are still preserved in the Bikaner archives, to know what kind of man he was.

One is also surprised that the Sikh community, particularly the Shiromani Gurdwara Parbandhak Committee, has kept quiet. Have they forgotten what Aurangzeb did to them?Guru Tegh Bahadur Ji - Was beheaded

Guru Tegh Bahadur was beheaded because he objected to Aurangzeb’s forced conversions. Aurangzeb, who had never forgiven the Sikhs for having supported his brother Dara, persecuted the Sikhs viciously. In response, Guru Gobind Singh transformed the Sikh community into a military community. Many perceive Guru Gobind Singh as no a warlord with any religious credentials; yet, he was a powerful military general who transformed the Sikhs into a militaristic society.

The Sikh community should debate whether they want to make Aurangzeb a hero or remain close to the Hindus? Why do not the Sikhs in Delhi lobby so that Aurangzeb Road in New Delhi is renamed after one of their gurus?

At least FOUR roads in New Delhi should proudly bear the names of the four sons of GURU GOBIND SINGH JI if our feeble and dying Hindustan is to give the last sign of life before expiring.

                                                                                                                          Younger sons of Guru Gobind Singh being bricked alive

Indian Muslims too have to make a crucial choice: do they want Aurangzeb’s inheritance to prevail upon Islam in India, or will they invoke Dara Shikoh’s spirit and bring the greatness of Sufism back into India?

Just stumbled on this concluding paragraph from a recent piece by Shekhar Gupta in which he takes on Krishna Menon wonder if he will ever say something similar about Aurangzeb. Read on

..Postscript: Do I have a personal wish on this sad anniversary? Yes. It is to be given a sand-blaster, a spray-paint can and an hour of amnesty. All I want to do is change the name of the avenue in central New Delhi named after Krishna Menon, the man primarily responsible for not just the humiliation of 1962 but also the loss of so many lives. A political system that still names avenues after an obstinate, autocratic disaster like him (whatever his filibustering brilliance), and that too, the avenue leading to its military headquarters, needs to introspect and correct its view of history. Or somebody pick up that sand-plaster and spray paint and rename it after Major Shaitan Singh or 13 Kumaon.[source]

I have just returned from Delhi and I was appalled to pass through a road named after the cruelest Mughal ruler Aurangzeb.

I must confess that I am disappointed that none of you accomplished journalists have asked the authorities to rename this road in order not to glorify the name of this most inhumane man. His atrocities against the non Muslims are well known. His name should be removed at once.

We are quick to change names like Bombay, Calcutta and Madras but fail to take action against removing the name of this cruel MOHAMMEDAN MONSTER from our road and especially in the heart of our capital. What a SHAME!

Please do something positive for your country and help change this unpleasant and offensive name of the road. Thanks. Why then should we be so anti British as to remove their names, yet ignore the Hindu killer Aurangzeb who converted so many people by brutal force, and committed heinous crimes against humanity, by naming a road in the capital of bleeding partitioned India after him?It was his deeds which laid the foundation of India’s partition on religious ground. Unfortunately this bleeding Islamic concubine called India has not seen the last of Aurangzeb’s legacy. There is more to come. Could we ask, how long will a road named after Prithviraj Chauhan survive in Lahore or Dhaka?

How long will Sonia Gandhi escape capture and GANG RAPE in Peshawar or Quetta? But in HINDUSTAN she is the uncrowned queen. Soon there will be umpteen roads named after her, and after Priyanka, too. Just wait to see the HINDUS’ love of KHANS, ALBANIANS and ITALIANS since we have ZERO “swadeshi” talent at home. The cowardly slavish NATIVES (Hindus) are terrified of the world backlash if they were to give decent HINDU and SIKH names to their roads and localities. By the way there is also a Shahjahan Road, an Akbar Road and a Sher Shah Suri Road in New Delhi, not to forget town provocative and degrading names like FAIZABAD, AURANGABAD, ALIGARH, TUGHLAQABAD, and ALLAHABAD and so on. After PARTITION that took the lives of one million Hindus, such names ought to have been “POISON” in the HINDU’S MOUTH.

Had it not been for AURANGI the Mughal dynasty may have prospered in India for much longer, even up to 20TH century, especially if DARA SHIKON had replaced Shah Jahan? But the MUSLIM FANATIC that AURANGI was, he antagonized all HINDU KINGS and within 13 years of AURANGIS death, by 1720, the MUGHAL rule ended and the Marathas become the de-facto rulers of India. The re-establishment of combined HINDU MARATHA -SIKH rule in India was only possible because of AURANGI. So AURANGI IS GREAT.

The MARATHAs and the SIKHS ruled most of India from 1720 to 1845, a period of about 125years, when the resurgent HINDU-SIKH rulers exterminated MUSLIMS from many part of India which would have not been possible without the contribution of AURANGI. SO AURANGI is certainly GREAT.

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