जीने की राह(भाग-4)बच के कहाँ जाओगे ,जैसा करोगे,वैसा भरोगे -लेखक सत्यमित्र

प्रकृति  अनंतकाल से ही सृष्टि को नियमबद्ध रूप से चला रही है,उसकी गति अनिरुद्ध व् अविरल है/वास्तव में निरंतर  गति ही जीवन का मूलाधार है/उपनिषदों  में भी” चरेवैती,चरेवैती “

का उपदेश दिया गया है/प्रकृति की विशाल कार्यशाला में सभी कार्यरत हैं/कर्मचक्र कभी थमता ही नही/ज्ञानिओं ने यहाँ तक कहा है कि कर्म प्रलय में भी नष्ट नहीं होते  अर्थात सृष्टि के संहार के समय भी यह बीज रूप में विद्यमान रहते है/ज्यों ही सृष्टि की पुनर्रचना  होती है ,पूर्व कर्मों के अनुसार प्राणी पुनः विभिन्न योनिओं में प्रगट हो जाते है/यही जीव जो आज हमारे नाम से जाना जा रहा है/ हमारे शरीर की छोटी बड़ी लाखों नस नाड़ियों में मचल रहा है,हमारे पैरों से चल रहा है और हमारे स्वर के रूप में गले से निकल रहा है//पता नही कितने जन्मों से कितनें भिन्न भिन्न आकृतिओं में और शरीरों में रूप बदल चुका है/

यह जीवन एक गतिवान चिंगारी है,जो इस जन्म में हमारे नाम से पुकारी जा रही है/इसी से संसार की सारी गतिविधियाँ है,सब रंगीनियाँ है तथा इसी से सब कुछ प्रकाशमान है/ आकाश के चाँद सितारे तोड़ो या संसार के सब सुख साधन जुटाओ,घर बसाओ,अत्याचार करो या विनम्रता और दया दिखाओ,यह हमारी आँखों की रोशनी तक ही सारा खेल है/आँखों  की  रोशनी बुझी नहीं,आँख  की पुतली थमी नहीं कि खेल खत्म /यह खेल दुबारा नहीं होगा/

मनुष्य ,जीवजन्तु,पशुपक्षी सभी ईश्वरीय कर्तव्य सहिंता के आधीन है/प्रत्येक कर्म उपयुक्त फल है/जो हम करते हैं तदनुसार हमें फल प्राप्त होता है/अन्य जीव जंतु तो अपने पूर्व कर्मों का फल भोगने के जन्म लेते हैं,परन्तु मनुष्य कर्म करने में स्वाधीन  है/जहां अन्य  योनिंया भोग योनिंया कहलाती हैं,मनुष्य योनी को कर्म योनी कहा जाता है/मनुष्य अपने भाग्य का स्वयम विधाता है/

सृष्टि में पूरा पूरा न्याय होता है,जब हम कर्म करने में स्वाधीन हैं तो उसके नियमानुसार उसका उचित फल मिलना भी तो आवश्यक है/इसमें किसी प्रकार के पक्षपात का प्रश्न ही नहीं उठता/हमारे कर्मों का फल तो हमारे जीवनकाल में ही मिल जाता है, शेष जो कर्म हम करते है,वह हमारी मानसिक मेमोरी डिस्क/हार्ड डिस्क पर पूरी तरह अंकित हो जाते हैं तथा डिलीट नहीं किये जा सकते/अंत समय तक जो हमारा अंकित शेष होता है तथा  जैसी  हमारी मानसिक स्तिथि  होती है वैसी ही हमें योनी प्राप्त होती है/अक्सर वर्तमान में यह देखा गया हैकि  मृतात्मा की शान्ति सभाओं में लोग  गायत्री मन्त्र का  उचारण  कर  मृतात्मा को समर्पित करते हैं/ यह कोई बैंक खाता नहीं जहाँ से एक खाते से दुसरे खाते में कर्मों को ट्रान्सफर किया जाये/ केवल आपके  ही कर्म ही आपके साथ जायेंगे/ यदि  आपने आजीवन दूसरों के प्रति विष घोला है और उन्हें हानि पहुंचाई है अथवा डसने पर तत्पर रहे हैं,तो निश्चितरूप से सांप,बिच्छु इत्यादि की या॓नि प्राप्त होगी/इसमें पृकृति को कुछ विशेष यत्न नहीं करना पड़ता/ ज्ञानी तो यहाँ तक कहते हैं कि  प्रत्येक आत्मा स्वयं अपना शरीर ढूंड लेती है/

कई बार हम दुष्ट व्यक्तिओं को खूब फलते फूलते देखते है/चोरों,दगाबाजों , भृषटाचारिया॓  ,हत्यारों का बाहुल्य है और उन्हें हम प्रसन्नता से औत प्रोत पते हैं,तो अत्यधिक आश्चर्य व दुःख होता है/हम भगवान् को कोसते है,भगवान् से विद्रोह भी कर बैठते हैं क्योंकि पीड़ित  व  सताए गए होते है,असहाय होते हैं/ परन्तु हम भूल जाते हैं कि भगवान् के घर देर बेशक हो पर अंधेर नही/वैसे भी  प्रत्येक कर्म का फल त्वरित और तत्काल नहीं मिलता/थोड़ा बहुत समय तो लगता ही है/किसी ने ठीक कहा चोर,डाकू,अत्याचारी को केवल मौज मस्ती करते हुए ही न देखो,उसे उस समय देखो जब उसे मार पिट रही   हो/

भगवान् जितने दयालु है,उतने कठोर भी/भगवान् की चक्की बहुत घीरे धीरे चलती है,परन्तु पापी को पीस के रख देती है/वैसे भी पापी को चैन कहाँ?जिस पर प्रभु क्रोधित हो जाये उसका कोई ठिकाना नहीं/कोई बचने का रास्ता नहीं/भगवान् की बेआवाज़ लाठी मनुष्य को चकनाचूर कर के रख देती है कि आत्मा तक काँप उठती है/

मनुष्य योनि में भगवान् ने अच्छा बुरा समझने की विचारात्मक ,विवेकात्म्क बुद्धि दे राखी है/इसी  बुद्धि के बल पर वह संसार में  विचरता है/यदि सुविवेक का प्रयोग किया तो उन्नति के शिखर से आकाश को छू लेता है,परन्तु अगर गिरने लगे तो गन्दी नाली का कीड़ा बन कर रह जाता है/

कभी कभी हम दूसरों के द्वारा दुखी किये जाते हैं,सताए जाते हैं/हमारा जीवन दूभर हो जाता है/दुष्ट अपनी दुष्टता द्वारा  सज्जन मनुष्यों की  सुख शान्ति लूटने का प्रयास करते है/हम निराश और व्यथित हो जाते है/कुछ भी नहीं सूझता,कोई सहारा नज़र नहीं आता और घबरा कर कुछ भी करने को उतारू हो जाते है/परिणाम दुखदाई और दूरगामी तनाव लेकर आता है/हमें  गंभीरता से सम्पूर्ण स्तिथि का विश्लेष्ण कर समस्या के निदान का उचित हल ढूडना चाहिए/निश्चितरूप से समय आने पर इन दुष्टों को उनके दुष्कर्मों का पूरा पूरा फल मिलता है/विचारशील मनुष्य होने के कारण हमारा भी कर्तव्य कि यथा संभव हम ऐसे समाजद्रोही तत्वों पर नियंत्रण रखे,उनसे निकटता न बढाये, अनावश्यक भयभीत न हो/अपना सामाजिक उत्तरदायित्व समझते हुए उन्हें नियमानुसार व मर्यादानुसार चलाये/अन्याय को सहना निष्कृष्ट प्रकार की कायरता है/अक्षम्य अपराध है गीता में भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया,उसका यही तो मूलाधार है/ /

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