जीने की राह(भाग-२)जीवन एक पहेली-लेखक -सत्यमित्र

क्या जीवन एक अनबूझ पहेली है?बहुत से लोग इस संसार के वृहत प्रसार को देख कर अचंभित एवं भ्रमित हो जाते है तथा जीवन के गूड रहस्यों को पूरी तरह नहीं समझ

पाते/ उनकी स्तिथि बिलकुल वैसी ही होती है जैसे कोई व्यक्ति बेतार यंत्रों से अनभिज्ञ होता हुआ भी रेडियो और टेलीविजन के कार्यक्रमों का आनंद प्राप्त कर लेता है/ईश्वर की सत्ता को पूर्ण रूप से अनुभव न कर सकने के बाबजूद तथा इस मायावी संसार की विशालता से अपरिचित होते हुए भी एक व्यक्ति साधारण रूप से अपना जीवन

व्यतीत कर लेता है/हालाँकि ज्ञान की कमी के कारण ऐसे व्यक्ति का जीवन निचले स्तर का अवश्य रह जाता है/

विज्ञान और तर्क का आपस में गहरा सम्बन्ध है/विज्ञान हम को बताता है की इस ब्रह्मांड में कुछ भी अकारण नही/यदि इस तथ्य पर विचार किया जाये तो हम अनुभव करेगे कि जीवन भी जीवों के जीने की पूर्ति मात्र है/ कोई जीव चाहे जिस स्तिथि में हो मरना नही चाहता/आत्मा की यही सबसे मूल्यवान आकांशा होती है/ आत्मा शरीर नहीं छोड़ना चाहती/ ,आत्मा की इस प्रबल इच्छा को सबसे प्रथम एवं स्वाभाविक माना गया है तथा आत्मा की इस प्रबल इच्छा को सृष्टि का मूल कारण माना जा सकता है/ जीवन कोई भुलावा या छलावा नहीं और न कोई मायाजाल,यह तो भगवान् की अनुपम लीला है/यह एक सिनेमा के परदे पर चल चलचित्र की तरह है और हम सब अपनी आँखों से सब कुछ देख रहे है/कितना कोतुकपूर्ण व चमत्कारिक नज़ारा है,जिसको देख कर हम आश्चर्यचकित है/भगवान् की बनाई हुई सृष्टि कितनी अनुपम,सम्पूर्ण एवं सुंदर है जिसको जब हम देखते है तो देखते ही रह जाते है/इस का चमत्कारिक सुंदर रूप देख कर ठगे रह जाते हैं तथा इसे देखने में इतने निमग्न हो जाते है की उसके निर्माता तक को भूल जाते हैं/लेकिन जब कोई बिरला प्रभुप्रेमी इसे अपनी अंतर्दृष्टि से देखता है तो उसे परमात्मा से लो लग जाती है,उसे भगवान् के सिवाय कुछ सूझता ही नहीं/सारी की सारी सृष्टि उसकी दृष्टि से ओझल होने लगती है और वह पुकार उठता है,

“जिधर देखता हूँ उधर तू ही तू है,जहाँ ढूडँता हूँ,वहां तू ही तू है”

गीता का उपदेश भी यही है तथा भारतीय पुरातन ऋषिओं एवं शास्त्रों ने यही बताया है की आत्मा नित्य एवं सनातन परमेश्वर का नित्य एवं अनादि अंश है तथा जीव बारम्बार नए सिर से उत्पन्न नहीं होता/आधुनिक विज्ञान के अनुसार भौतिक द्रव्यों का नाश नहीं होता,वह केवल अपना भौतिक स्वरुप बदलते रहते हैं/लकड़ी जल कर कोयला अथवा राख इत्यादि का रूप धारण कर लेती है/इसी प्रकार तत्वज्ञानियो ने यह निष्कर्ष निकाला है की भौतिक शरीर को छोड़ कर आत्मा नए नए शरीरों में प्रगट होती है,मरती नहीं/आत्मा अमर है तथा देह से भिन्न है/जब पुण्यात्मा अपनी इच्छाओं और तृष्णाओं से  ऊपर उठती है तो आत्मा जन्म मरण के चक्र से निकल कर परमात्मा में लीनं हो जाती है तथा उसको सदगति और शान्ति प्राप्त हो जाती है/

आज का मानव भौतिक प्रगति की चकाचौंध से चुंधिया सा गया है तथा उसकी दृष्टि स्पष्ट देखने में असमर्थ है,उसको रास्ता ही नहीं सूझ रहा/इस भौतिक भूलभुलैया में खो गया है,भ्रमित है,कुछ सूझता ही नहीं/वह उस परमपिता परमात्मा के विराट रूप तथा उसकी विशालता ,उसकी लीला के प्रसार को देख कर उसके सार को भूल गया है/ये संसार कर्म का रंगमंच है तथा प्रत्येक कर्म का ईश्वरीय नियमों के अनुसार न्यायपूर्ण फल मिलता है/संसार के चलने का यही ईश्वरीय विधान है/परमपिता परमात्मा न्यायकारी है/मनुष्य कुछ भी करे ,उसे तदानुसार फल अवश्य मिलेगा/इसी ईश्वरीय विधान तथा कर्म एवं कर्मफल के न्याय पर सारी सृष्टि आश्रित है/

यदि हम अपनी आँखे खोल कर देखे तो हर जगह उदास नकली चेहरे,भटकती निगाहें,अस्थिर बुद्धियाँ और खिन्न मन दिखाई देंगे/राग रंग,खेल तमाशे,सिनेमा नाटक,बाहरी चमक दमक सब एक आन्तरिक वेदना को छूपाये हुए है/सोजन्यता की उधारी मुस्कान इन चेहरों पर चस्पां है/जकड़े चेहरों पर एक विशेष अभिव्यक्ति की तिलमिलाहट अंकित है/सुख और शान्ति कहीं ढूडन॓ से भी नहीं मिलती/हम झूठी तसल्लिओं से अपने आप को सांत्वना देना चाहते है/हम खिलोनों से मन बहलाना चाहते और जिंदगी की तीखी और कटु सचाईओं को नशे में डुबो कर भुलाना चाहते हैं/हम कभी धन के पीछे भागते है तो कभी शारीरिक सुख और सौन्दर्य पर मर मिटते है/कभी झूठे यश को प्राप्त करना चाहते हैं तथा स्वयं ही अपने आप को छलते है/कभी सत्ता की खोज में खो जाते है,परन्तु फिर भी मन भटकता है और दिल की लगी नहीं बुझती/कितना अशांत और तनावग्रस्त है वर्तमान जीवन,कितनी उलझनों से भरा हुआ/”हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी,फिर भी तनहाई को है बेकरार आदमी”थके थके से ,क्लांत ,जीवन से हारे जीवन पथिक,जिंदगी का बोझ उठाये,सिर झुकाए चले जा रहे है,पता नही किधर/गिरते,लुड्कते,खाक छानते हुए निरुदेश्य एक अनिश्चित ,संशयग्रस्त अज्ञात भविष्य की और बड़ते हुए/लगता है जीवन में कोई उत्साह ही नही,मानो जीवन एक ओपचारिकता मात्र है/जीवन उसके हाथों से खिसकता जा रहा है और जीवन पथिक मन मसोसे निस्सहाय और स्तब्ध खड़ा देख रहा है/किसी ने बखूब कहा है,

“लाई हयात आये,क़ज़ा ले चली चले,अपनी ख़ुशी न आये,न अपनी ख़ुशी चले”

हम अपने दुखों ,कष्टों  के लिए दूसरों अथवा भगवान् पर दोष  मढन॓   से नही चूकते,भाग्य का रोना रोते हैं,परन्तु अपने अंदर झांक कर नहीं  देखते/हम यह भूल जाते हैं की हमें अपनी करनी का फल मिल रहा है तथा हमारे दुखों के हम स्वयं अथवा हमारे जैसे अन्य लोग ही उत्तरदायी   है/  यही कड़वा सच है/

“नहीं देता कोई किसी को सजाए ,सज़ा बन के आती हैं अपनी खताए “

अन्तर्मुखी     तथा स्वार्थी होने के कारण हम प्रसन्ता से वंचित हो जाते है, सामाजिक सोजन्य को अपने वैयतिक लाभ के लिए ताक पर रख देते हैं/जब अपने स्वार्थ के वशीभूत पाप करने में हमें कोई हिचक नही तो फिर उसका फल मिलने पर रोने से क्या लाभ/भगवान् को कोसना,भाग्य का रोना रोना एवं चीखना चिलाना फिजूल एवं मिथ्या है/भगवान् न्यायकारी है तथा उसके न्याय की तराजू में हम पूरी तरह त्तुल जाते हैं,रत्ती भर भी अंतर नहीं होता/अपने कर्मों के तथा ईश्वर के विधान के अनुसार हमें स्वतः फल मिलता रहता है/भगवान् की सत्ता में किसी प्रकार का पक्षपात एवं अन्याय असंभव है/”कर्मों के अनुसार हो तेरा हिसाब,वहां न रिश्वत दे सकोगे तुम जनाब/सज़ा जजां हरगिज़ न टाली जायेगी”

मानवीय बुद्धि पाप और पुण्य में अंतर करना बखूबी जानती है/निर्मल,स्वच्छ मन में सत्य का प्रतिबिम्बित होना स्वाभाविक है/

जानामि धर्म न च में प्रवतिः/जानामि अधर्म न च में निवृतिः //

में धर्म को भली भांति जानता हुआ भी धर्म के मार्ग का अनुसरण नहीं करता तथा अधर्म को पहिचानते हुए भी उससे बच नहीं पाता /विचारा॓ की अपेक्षा  कर्मों की  महिमा एवं

महत्व  कही अधिक है/सत्यासत्य का अंतर जान,सत्य के मार्ग पर चल कर अपने जीवन को  ढालन॓  में ही हमारा तथा  प्राणियो  का कल्याण है/यह शाश्वत मत हैकि  सत्य का मार्ग अपनाने पर कोई समस्या नहीं रह जाती/

Advertisements
This entry was posted in Uncategorized and tagged , , , , , , , . Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s