जीने की राह(भाग-१) -लेखक सत्यमित्र

मनुष्य देह अत्यंत दुर्लभ है तथा ईश्वर की  सर्वश्रेठ कृति है/  जीवन उसी परमपिता परमात्मा की ही देन  है/जीवन एक अनुपम अनुभव है तथा मनुष्य की सर्वप्रिय उपलब्धि / साधारण शब्दों में हमारी स्तिथि रेलगाड़ी के यात्रिओं जैसी है, गाड़ी खटाखट चली जा रही है,रास्ते में जब कोई स्टेशन आता है तो कुछ यात्री उतर कर अपने गंतव्य पर चल देते है तथा कुछ नए यात्री गाड़ी में सवार हो जाते हैं और फिर गाड़ी  आगे चल पड़ती है/यह क्रम जारी रहता है/बहुधा गाड़ी  में स्थान को लेकर झगडे भी हो जाते हैं,लेकिन गाड़ी  चलती ही रहती है/

इस बात पर आश्चर्य होता है ,की हम छोटी मोटी यात्रा  के लिए अनेक प्रबंध करते हैं, सौ सामान जोड़ते हैं,परन्तु अनंत महान जीवन यात्रा के विषय में सोचते तक ऩही और ज्यों त्यों करके किसी प्रकार जिंदगी के दिन काट लेते हैं,हंस लेते हैं,रो लेते हैं,खा लेते हैं,पी लेते हैं तथा सांस चलने को ही जीवन समझ कर जी लेते हैं/ऐसा होते होते होते अंतिम समय भी आ पहुँचता है,सब काम ज्यों के त्यों छोड़,सब रिश्ते नाते तोड़,दिल की दिल में लिए,आन की आन में,हम इस संसार से अकेले ही चल देते हैं,एक अज्ञात मंजिल की और,ना जाने किधर/

परन्तु जब तक मनुष्य जीवित रहता है, वह किसी को कुछ समझता ही नही  / वह इस संसार के स्वामी भगवान् तक को  भूल जाता है/माना की मनुष्य अन्य जीवों की अपेक्षा बहुत बुद्धिमान है तथा शक्तिशाली है/पृकृति ने मनुष्य को बुद्धि    देकर मालामाल कर दिया है,परन्तु हमे यह भी नही भूलना चाहिए की हमारा यह क्षणभंगुर    मानवीय जीवन भी पानी के बुलबुले के समान ही है/ आखिर एक सांस के आने या  न आने पर ही तो हमारा जीवन निर्भर है/यदि कोई मृत्यु को दूर समझता है तो उसे कभी कभी श्मशानघाट या कब्रिस्तान का चक्कर अवश्य लगा आना चहिये/

“काल की आज्ञा में कैसे कैसे जोरावर चले,शाह,शहंशाह,सितमगर और सारे हिम्मतवर चले/

क्या मजाल इस हुकुम की,कोई अदूली कर सके,कौन यहाँ पर रह सके,जब काल का चक्कर चले//”

“कहाँ गए वोह अर्जुन योद्धा कहाँ गए वोह भीम बली,काल के आगे सब नतमस्तक ,नहीं किसी की एक चली”

मानव जीवन पिछले जन्मों में किये अच्छे संचित कर्मों के फलस्वरूप ही मिलता है/इस संघर्षशील संसार में मनुष्य को हजारों कठिनाईया॓ एवं कष्टों से दो चार होना पड़ता है,परन्तु अनगिनत सुख भी है,जो अन्य  प्राणिया॓ को प्राप्त नहीं/

इस सुनहरे अवसर का हमे पूरा पूरा लाभ उठाना चाहिए तथा आत्मिक उन्नति व् इस संसार के कल्याण के लिए जो बन पड़॓, करें,यही उचित है/जीवन अच्छी तरह न बिताने पर जीवन के अंतिम दिनों में पश्चाताप और दुःख की पीडा बड़ी कष्टदाई होती है/इसी प्रकार की अनुभूति प्रसिद्ध उर्दू कवि ग़ालिब को भी हुई/

“जान दी,दी हुई उसी की थी,हक तो यह है, कि हक अदा न हुआ/”

भगवत्कृपा    से प्राप्त मानुषी जीवन को सार्थक  बनाने का एक मात्र मार्ग है संतोष और सेवा/इसी से उस परमपिता परमात्मा का ऋण चुकाया जा सकता है/अच्छे कर्मों द्वारा सुख और मानसिक शान्ति ही नहीं मिलती बल्कि हम उस परमपिता परमात्मा तक को प्राप्त कर सकते हैं./मनुष्य को जीवनयात्रा आरम्भ करते समय विचारशक्ति का पूरा उपयोग करना चाहिए/उसे मनन द्वारा,चिंतन द्वारा निश्चय कर लेना चाहिए कि उसे किधर जाना है,उसकी मंजिल कौन सी है तथा उसे कौन सा मार्ग चुनना है/लक्ष्य तक पहुचने के मार्ग में आने वाली अनगिनत बाधाओं, कठिनाईया॑॓  के लिए सदैव   तत्पर रहना चाहिय॓/किसी ऊचे उदेश्य के लिए समग्र शक्ति एवं जागरूकता से प्रयास करने चाहिय॓/

जीवनयात्रा के लिए एक आंतरिक उत्तम सांकेतिक  पद्धति अपनानी चाहिय॓,यानी  निरिक्षण,परीक्षण,अध्ययन एवं चिंतन द्वारा मनुष्य अपनी स्तिथि के अनुसार  कोई भी  मार्ग  निकाल लेता है/भगवान्   की अनुकम्पा से मिला मार्गदर्शन बहुत ही अचूक है/इससे जीवनयात्रा सुगम हो जाती है/ मनुष्य यदि केवल अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को ही सुनने का अभ्यास करले तो वह  कभी गलत मार्ग को अपना ही नहीं सकता/अंतरात्मा की आवाज़ गलत कार्य करने वाले की गति कम कर देती है यानी स्पीड  ब्रेकर का काम करती है, वं उसे आने वाले खतरे से सावधान कर देती है/अगर हम केवल अपनी अंतरात्मा की आवाज के अनुसार ही चलने का अभ्यास कर ले तो जीवनयात्रा किसी खतरे की चिंता  से मुक्त हो जाये और जीवन सुगम ,सरल एवं सफल हो जाये/

इस संसार में आकर नाचो ,कूदो, हंसो एवं खेलो/परमपिता परमात्मा ,जो आनंदस्वरूप एवं सचिदानंद है,ने यह संसार हमारे सुख और कल्याण के लिए ही बनाया है,जीवन में तो केवल आनंद  ही आनंद है/दुःख तो केवल हमारे संचित बुरे कर्मो का फल है/मृत्यु तो केवल नए जीवन का सन्देश है/जीवन जीने के लिए है कोई जेल की सज़ा नहीं जो काटी जाये/हाँ संसार की चकाचोंध एवं झूठी माया में ना खो जाओ/कमल की तरह कीचड़    और जल से ऊपर रह कर खिलना सीखो/

एक अनुमान के अनुसार संसार में प्रतिवर्ष विभिन विषयों पर लगभग ३५०००  पुस्तके प्रकाशित होतो हैं/स्पष्ट है हमारे ज्ञान में धडाधड वृद्धि हो रही है/नए नए अन्वेषणों एवं खोजों ने इस संसार की तस्वीर ही बदल दी है/परन्तु खेद का विषय है की हमारे-बड़े  हुए ज्ञान भण्डार के बाबजूद हम आत्मिक उन्नति की राह पर आगे नहीं बढ नहीं पा रहे/

“अक्ल बारीक हुई जाती है,रूह तारीक हुई जाती है”/

“आजकल मानसिक सुख एवं शान्ति बिरले लोगों को ही प्राप्त है,सद्भावना और सोहार्द दिन प्रतिदिन कम हो रहे हैं/जीवन की सुगंध एवं मिठास  मिटती जा रही है/तनाव और पीड़ा हमारे जीवन में विष घोल रही है/इस निंदनीय और धिक्कार जीवन का मानों कोई अर्थ ही नहीं/  जीवन का सुंदर और पुरातन रूप अब कहाँ है?समाज जीवन के आकार एवं स्वरुप को खो चुका है/जीवन लगता है हाथ से निकला जा रहा हैऔर मानव निस्सहाय और स्तब्ध खड़ा देख रहा है/

“जिंदगी की इस दुखदाई रेल पेल में जीना भी को जीना है,सुख और प्रसनता का कोई नाम नहीं,पीड़ा का नित्य विष पीना है/”

छटपटाते चेहरों पर अंकित दुःख और पीड़ा हर कोई पड़ता है,इस वर्तमान ,अभिशप्त जीवन की  संघर्षमय दौड़ में नित्य मनुष्य मरता है/”

हमारा मुख्य उदेश्य विभिन ग्रन्थों,महात्माओं के विचारों,विचारकों के अनुभवों के आधार पर सरल और सुगम भाषा में उनका संकलन कर मानव जीवन का महत्व  बतलाना है ताकि यह अमूल्य जीवन सुखमय,ईश्वरमय    और शांतिमय होकर बिता सके/ यह ठीक है की आजकल किसी की कोई बात सुनने को तैयार नही,फिर भी इस कठिन जीवन यात्रा के साथिओं को इस छोटी सी पुस्तिका द्वारा सन्देश देना हमारा कर्तव्य है/मुझे आशा ही नहीं , पूर्ण  विश्वास है की हमारे इस लघु प्रयास को आपका हार्दिक समर्थन  प्राप्त होगा/

“यह मानों ना मानों तुम्हारी है मर्ज़ी,हम नेको बद हुज़ूर को समझाए जाते है/”

“मेरी बातों पर मित्रों कुछ ध्यान कर लो,कहानी नहीं यह फ़साना नही है/”–“सत्यमित्र

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